मनुष्य जीवन में पितरों का योगदान औरपितरि दोष व पितरि शांति के उपाय:- आचार्य राजेन्द्र शर्मा
Global Kundli Vastuके आचार्य राजेन्द्र शर्मा बताते हैं किकिसी भी जातक (मनुष्य) को मानव जीवन उसके प्रारब्ध(पूर्व जन्मों) कर्मों के आधार पर ही प्राप्त होता है। कोई भी जातक (मनुष्य) के घर में जन्म लेगा या कोई पशु-पक्षी होगा। वह अमीर होगा या गरीब होगा। उसको राजयोग प्राप्त होगा या नहीं। जातक स्वस्थ होगा अथवा किसी महारोग से ग्रसित होगा या दिव्यांग होगा। ये कोई और नहीं बल्कि उसके द्वारा पूर्व जन्मों में किए गए शुभाशुभ कर्म निर्धारित करते हैं, जिन्हें इस वर्तमान जन्म में प्रारब्ध कहा जाएगा।
किसी भी जातक की जन्म कुण्डली कुछ और नहीं बल्कि जातक के द्वारा पूर्व जन्मों में किए गए शुभ-अशुभकर्मों का ग्राफ मात्र है। यदि किसी जातक ने शुभ-कर्म किए हैं तो उसे धर्मात्मा और योग्य विद्वान संस्कारी लोगों के परिवार में ब्राह्मणादि कुल में जन्म प्राप्त होता है। क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है कि
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ।।
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्। एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्।।
जिस जातक ने पूर्वजन्म में अशुभ कर्म किए होते हैं। उनका निम्न धर्महीन, कर्तव्य भ्रष्ट मूढ़ और असदाचरण लोगों से सम्बन्ध इस जीवन में बनता है। जातक को कुण्डली के राजयोगों प्राप्ति और दोषों का सामना भी अपने प्रारब्ध के शुभाशुभ कर्मों के परिणामस्वरूप ही करना पड़ता है।
किसी भी जातक की जन्मकुण्डली में बनने वाले घातक दोषों में पित्र-दोष बहुत ही महत्वपूर्ण है।पित्र-दोष के कारण जातक को जीवन में भयंकर समस्याओं का सामना करना पड़ता है।पित्र- दोष के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं
जब माता-पिता की कोई इच्छा अधूरी रह जाती है और उनका देहावसान हो जाता है तो जातक के पित्र-दोष के प्रभावों का सामना करना पड़ता पड़ता है।
जब हम माता-पिता समान लोगों को जाने-अनजाने दुःख पहुँचाते हैं तो भी हमें पित्र- दोष के परिणामों का सामना करना पड़ता है।
जब जातक अपने पूर्वजों के निमित्त कोई दान-स्नान अथवा अनुष्ठान आदि नहीं करता है, तो भी पित्र दोप के प्रभाव हमारे जीवन में दिखाई देते हैं।
जो लोग श्राद्ध कर्म का परित्याग करते हैं तथा ये सोचते हैं कि पितर नहीं होते। श्राद्ध क्यों करना, उन्हें भी पित्र-दोष के दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं और उसके रक्त का पान उसके पितर करते हैं क्योंकि कहा गया है:-
न सन्ति पितरश्चेति कृत्वा मनसि यो नरः।
श्राद्धान् न कुरुते तत्र तस्य रक्तं पिबन्ति ते।।
पित्र-दोष के निम्नलिखित प्रभाव जीवन में दिखाई देते हैं:-
1 अत्यधिक परिश्रम के बाद भी पारिवारिक जनों को कार्योंमें सफलता नहीं मिलती।
2 बनते हुए कार्य अचानक बिगड़ जाते हैं।
3 घर-परिवार में कन्याओं की अधिकता होती है।
4 पशु आदि में और कारोबार में लाभ दिखाई नहीं देता है।
5 अत्यधिक निर्धनता और कर्जे का बोझ उठाना पड सकता है।
6 पित्र-दोष के कारणवशात् समाज में बदनामी का भी सामना करना पड़ सकता है।
7 परिवार में विवाह योग्य युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पाता बार-बार अड़चनों का सामना करना पड़ता है।
8 वैवाहिक जीवन में समस्याएं आ जाती ।
9 संतान प्राप्ति में समस्याएं आ जाती हैं।
10 तीव्र पित्र-दोष होने पर परिवार में से पुरुषों की संख्या धीरे-धीरे घटने लगती है। परिवार में केवल महिलाएं दिखाई देती है। पुरुष एक-एक करके परलोक सिधार रहे होते हैं।
इनकेअतिरिक्त भी बहुत से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रभाव पित्र दोष से जीवन में हो सकते हैं।
यदि किसी को उपरोक्त लक्षण / प्रभाव दिखाई दें तो निम्न समाधान हो सकते है
जो लोग देवता,पितर, अग्नि और ब्राह्मण आदि की पूजा करते हैं वे सभी प्राणियों के आत्मास्वरूप भगवान विष्णु की ही पूजा करते हैं यमस्मृति में कहा है –विष्णुमेव यजन्ति ते।
पितरि कार्य को देवकार्य से बढ़कर बताया गया है। पितृपूजा देवपूजा से बढ़कर है ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा है :-
देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते।
देवताभ्यः पितृणां हि पूर्वमाप्यायनं शुभम्।।
इसलिए मनुष्य को वंशहीनता और निर्धनता से बचने के लिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। सुमन्तु ऋषि कहते हैं कि श्राद्ध से पुण्यवान् कोई कर्म इस संसार में नहीं है–श्राद्धात्परतरंनान्यत् श्रेयस्करमुदाहृतम् ।।
आचार्य जी बताते हैं पितरि कार्यों के लिए श्राद्ध पक्ष का विशेष महत्व है। अश्विन मास के प्रारंभ के पंद्रह दिनों का श्राद्ध पक्ष होता है इसमें पितरों के लिए किये गए पुण्य कार्य पितरों को प्राप्त होते हैं। 2026 में श्राद्ध पक्ष इस प्रकार से रहेगा।
सं० 2083 के श्राद्ध की तिथि व तारीख
पूर्णिमा का श्राद्ध 26-9-26 शनिवार
एकम् का श्राद्ध 27-9-26 रविवार
दूज का श्राद्ध 28-9-26 सोमवार
तीज का श्राद्ध 29-9-26 मंगलवार
चोथ का श्राद्ध 30-9-26 बुधवार
पंचमी का श्राद्ध 1-10-26 बृहष्पतिवार
छट का श्राद्ध 2-10-26 शुक्रवार
प्रात: 10 बजकर 15 मिनट से पहले
सातम का श्राद्ध 2-10-26 शुक्रवार
प्रात: 10 बजकर 15 मिनट के बाद
आठम का श्राद्ध 3-10-26 शनिवार
नवमी का श्राद्ध 4-10-26 रविवार
दसमी का श्राद्ध 5-10-26 सोमवार
ग्यारस का श्राद्ध 6-10-26 मंगलवार
बारस का श्राद्ध 7-10-26 बुधवार
तेरस का श्राद्ध 8-10-26 बृहष्पतिवार
चोदस का श्राद्ध 9-10-26 शुक्रवार
अमावस का श्राद्ध 10-10-26 शनिवार
पित्र-दोष निवारण के लिए तीर्थ आदि पर निम्नलिखित कार्य किए जा सकते हैं –
1 त्रिपिण्डी श्राद्ध
2 पिण्ड दान
3 पितरि-तर्पण
4 तीर्थ-स्नान
5 अमावस्या और संक्रांति आदि को पितरि सूक्तम् का पाठ तथा ब्राह्मणों को भोजन करवाना वस्त्र आदि का दान देना।
6 श्राद्ध के दिनों में पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन, गायों को चारा, कौओं ,कुत्तों तथा भुखों को भोजन
7 पितरों के निमित्त गायत्री जप एवं श्रीमद्भागवत का मूलपाठ
उपरोक्त के अतिरिक्त भी पितरि प्रसन्नता के लिए बहुत से उपाय हो सकते हैं जैसे पितरों के नाम से
कुआ खुदवाना,अस्पताल बनवाना, विद्यालय बनवाना,धर्मशाला बनवाना, पीपल व बरगद आदि वृक्ष लगाना, मंदिर बनवाना
आचार्य राजेन्द्र शर्मा